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जिमखाना क्लब चुनाव - 2 और 2 फार्मूले से सत्ता का खेल ?

PUBLISH DATE: 13-03-2026

अंदरखाते बन रहे समीकरण, अमित कुकरेजा को रोकने के लिए ग्रुपों की रणनीति तेज


 


(ELECTIONS 202 - UPDATE)


 


 


जालंधर, 13 मार्च :  जिमखाना क्लब के बहुप्रतीक्षित चुनावों और एजीएम से ठीक पहले क्लब की सियासत में एक नया मोड़ आता दिखाई दे रहा है। पहले ही दोनों पुराने और चिर-विरोधी ग्रुपों पर सत्ता हथियाने के लिए अंदरखाते समझौते की चर्चाएं गर्म थीं, वहीं अब क्लब के अंदर एक नए “2+2 फार्मूले” की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार इस फार्मूले के तहत दोनों ग्रुप अपने-अपने दो उम्मीदवारों को प्रमुख पदों पर फिट करने की योजना बना रहे हैं, ताकि चुनावी मुकाबले से बचते हुए कई पदों पर निर्विरोध जीत हासिल की जा सके।


क्लब सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक इस प्रस्तावित समीकरण के तहत सौरभ खुल्लर को सैक्रेटरी के पद पर, तरूण सिक्का को जूनियर वाइस प्रधान के पद पर, हरप्रीत सिंह गोल्डी को ज्वाइंट सैक्रेटरी और धीरज सेठ को कैशियर के पद पर उतारने पर सहमति बनती दिखाई दे रही है। बताया जा रहा है कि यह “2+2 फार्मूला” दोनों ग्रुपों के बीच संतुलन बनाकर सत्ता पर पकड़ बनाए रखने की रणनीति के रूप में तैयार किया जा रहा है।


 


                                    


 


                                     


 


हालांकि इस समीकरण में भी अंदरूनी खींचतान की चर्चा सामने आ रही है। क्लब के अंदर दूसरे समीकरण की भी चर्चा जोरों पर है। सूत्रों के मुताबिक प्रो. विपन झांजी, जो अब तक खुद को सैक्रेटरी पद का सबसे मजबूत दावेदार मान रहे थे, इस फार्मूले से नाराज़ बताए जा रहे हैं। उनकी नाराज़गी को देखते हुए एक नए विकल्प पर भी विचार किया जा रहा है, जिसके तहत तरूण सिक्का को बाहर बैठाकर प्रो. विपन झांजी को जूनियर वाइस प्रधान के पद पर चुनाव लड़ाने की रणनीति बनाई जा रही है।


 


 



 


 


 



 


 


 


बताया जा रहा है कि इस पूरे खेल का उद्देश्य दोनों ग्रुपों के बीच दो-दो उम्मीदवारों को समायोजित कर चुनावी मुकाबले को कम से कम करना और अधिक से अधिक पदों पर निर्विरोध जीत सुनिश्चित करना है। लेकिन इस रणनीति को लेकर क्लब के कई सदस्यों में असंतोष की भावना भी देखी जा रही है।


 


शहर में दो गुटों की लड़ाई एवं मनमुटाव को दूर करने के लिए आम सहमति बनाकर एक ग्रुप बनाने पर हो रहा है विचार - तरूण सिक्का


पहले भी बतौर सैक्रेटरी काम कर चुके और इस बार भी सैक्रेटरी पद के सश्कत दावेदार तरूण सिक्का से जब बात की गई तो उन्होंने कहा कि फिल्हाल कौन चुनाव लड़ेगा और कौन नहीं, इसका कोई फैसला नहीं लिया गया है। केवल इस बात को लेकर प्रयास ज़रूर किए जा रहे हैं कि शहर में पिछले लंबे समय से जो गुटबाज़ी चल रही है और दो ग्रुपों की चुनाव के समय लड़ाई होती है और बाद में कुछ सदस्यों के मन में टीस रह जाती है। उसे खत्म करने के लिए एक ही ग्रुप बनाकर उम्मीदवार घोषित किए जाएं, न कि दो परस्पर विरोधी ग्रुप की छवि लेकर चुनावी मैदान में उतरा जाए।


 


मैं अपने ग्रुप का सिपाही, जो कोर कमेटी फैसला लेगी वही सबको होगा मान्य, मगर फिल्हाल सभी बातें केवल अटकलें, कोई सच्चाई नहीं  - विपन झांजी


वहीं जब इस संबधी प्रोग्रेसिव ग्रुप की तरफ से बतौर सैक्रेटरी उम्मीदवार सबसे सशक्त उम्मीदवार, जिन्हें हरी झंडी देने की बात खुद ग्रुप के चेयरमैन स्वीकार कर चुके हैं प्रो. विपन झांजी से बात की गई तो उन्होंने कहा कि वह तो अपने ग्रुप के एक सिपाही हैं। कोर कमेटी जो भी फैसला लेगी वह सबको मान्य होगा। मगर जो भी बातें शहर या क्लब में चल रही हैं, वह केवल अटकले हैं और इसमें कोई सच्चाई नहीं है। फिल्हाल किसी उम्मीदवार के नाम पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। 


 


किसी भी ग्रुप के साथ समझौता करने के बजाय “एकला चलो रे” की नीति पर चलते हुए लगातार क्लब सदस्यों के बीच सक्रिय नजर आ रहे अमित कुकरेजा


सूत्रों का कहना है कि इन तमाम समीकरणों के पीछे सबसे बड़ा कारण एक ही नाम है – अमित कुकरेजा। दोनों ग्रुपों के लिए अमित कुकरेजा को चुनाव में जीतने से रोकना एक बड़ी चुनौती बन गया है। बताया जा रहा है कि उन्हें हर हाल में रोकने के लिए ग्रुपों के कर्ता-धर्ता एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं और इसी कारण यह नए-नए समीकरण तैयार किए जा रहे हैं।


दूसरी ओर अमित कुकरेजा किसी भी ग्रुप के साथ समझौता करने के बजाय “एकला चलो रे” की नीति पर चलते हुए लगातार क्लब सदस्यों के बीच सक्रिय नजर आ रहे हैं। वह व्यक्तिगत रूप से सदस्यों से मिलकर समर्थन जुटाने में लगे हुए हैं।


क्लब के कई जानकार सदस्यों का मानना है कि अगर अमित कुकरेजा निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में या फिर संभावित “थर्ड फ्रंट” बनाकर चुनाव मैदान में उतरते हैं, तो मुकाबला पूरी तरह दिलचस्प हो सकता है। कई सदस्य पहले से ही पुराने ग्रुपों की राजनीति से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं, जिसके चलते निर्दलीय विकल्प को भी मजबूत समर्थन मिलने की संभावना जताई जा रही है।


अब सभी की निगाहें एजीएम और चुनावी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। देखना यह होगा कि क्या “2+2 फार्मूला” सचमुच लागू होता है या फिर क्लब के सदस्य इस रणनीति को नकारते हुए चुनावी मैदान में नया समीकरण खड़ा कर देते हैं।