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पैसों का लालच या समाज में दबदबा बनाने की होड़ ?

PUBLISH DATE: 13-03-2026

जिमखाना क्लब की सत्ता को लेकर उठने लगे सवाल


(ELECTIONS - 2026)


 


जालंधर, 13 मार्च : जिमखाना क्लब के आगामी चुनावों को लेकर शहर के सामाजिक और कारोबारी हलकों में हलचल तेज हो गई है। चुनावों की घोषणा से पहले ही क्लब की सत्ता को लेकर जिस तरह से अंदरखाते जोड़-तोड़ और बैठकों का दौर चल रहा है, उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है आखिर जिमखाना क्लब की सत्ता पर कब्ज़ा जमाना इतना ज़रूरी क्यों माना जा रहा है ? क्या इसके पीछे पैसों का लालच है या फिर समाज में अपना दबदबा कायम करने की होड़ ?


क्लब के कई सदस्यों और जानकारों का मानना है कि जिमखाना क्लब केवल मनोरंजन या सामाजिक गतिविधियों का केंद्र नहीं रहा, बल्कि समय के साथ यह शहर के प्रभावशाली लोगों के नेटवर्क का महत्वपूर्ण मंच बन गया है। क्लब की कमेटी में जगह मिलना कई लोगों के लिए प्रतिष्ठा और प्रभाव का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि हर चुनाव के समय यहां राजनीतिक माहौल जैसा तनाव देखने को मिलता है।


 



 


सूत्रों के अनुसार क्लब की सत्ता पर काबिज़ होने से कई तरह के फैसलों पर प्रभाव पड़ता है। क्लब की संपत्तियों, बड़े आयोजनों, सदस्यता से जुड़े निर्णयों और अन्य प्रशासनिक मामलों में कमेटी की अहम भूमिका होती है। ऐसे में कुछ लोग इसे प्रभाव और पहचान बढ़ाने का साधन मानते हैं, जबकि कुछ आलोचकों का कहना है कि इसके पीछे आर्थिक हितों की संभावनाएं भी एक कारण हो सकती हैं।


कई वरिष्ठ सदस्य इस बात पर भी चिंता जता रहे हैं कि क्लब की राजनीति अब सामाजिक सौहार्द से ज्यादा गुटबाज़ी और व्यक्तिगत हितों का मैदान बनती जा रही है। उनका कहना है कि क्लब का उद्देश्य सदस्यों के बीच मेलजोल बढ़ाना और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा देना होना चाहिए, लेकिन चुनावों के दौरान जिस तरह की रणनीतियां और समीकरण बनाए जा रहे हैं, उससे क्लब की छवि प्रभावित हो सकती है।


 



 


इस बीच कुछ सदस्य यह भी मानते हैं कि क्लब की कमेटी में आने से समाज में एक अलग पहचान और प्रतिष्ठा मिलती है। शहर के कई बड़े कारोबारी, प्रोफेशनल और प्रभावशाली लोग क्लब से जुड़े हुए हैं, इसलिए कमेटी में पद हासिल करना सामाजिक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम भी बन जाता है।


इसी वजह से हर चुनाव से पहले नए समीकरण बनते हैं, पुराने विरोधी एक मंच पर आ जाते हैं और कई बार नए गुट भी उभरकर सामने आते हैं। इस बार भी चुनाव से पहले ऐसी ही चर्चाएं जोरों पर हैं, जिससे साफ है कि जिमखाना क्लब की सत्ता केवल एक पद नहीं बल्कि प्रभाव, प्रतिष्ठा और संभावित हितों का प्रतीक बन चुकी है।


अब देखना यह होगा कि आगामी चुनावों में सदस्य इन तमाम चर्चाओं और आरोपों के बीच किसे क्लब की बागडोर सौंपते हैं और क्या आने वाली कमेटी क्लब की मूल भावना और पारदर्शिता को बनाए रखने में सफल हो पाती है या नहीं।